Quotes

विचार संग्रह

विजय सिंह पथिक के विचार

यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं जीवन न रहे, यदि इच्छा है तो यह है, जग में स्वेच्छाचार दमन न रहे। — विजय सिंह पथिक
भूल न जाना खुशी के दिन तुम, वतन परस्तों के, वे फसाने, कि जिनके बदले हुए मय्यसर, ये जश्न महफिल और तराने, लेटो पलंग पर तब याद करना उन नौजवानों की जान बाज़ी, जिन्होंने फांसी के तख्तो पर ही, थे नींद लेने को पैर तानें। — विजय सिंह पथिक
दरअसल किस्मत महज एक छलावा है जो चालक लोगों द्वारा वंचितों मजलूमों और शादियों मजलूमों को सदियों से दबाने के लिए कड़ा गया है ताकि यह लोग अपने गरीबों का दोष किस्मत को देते रहे और व्यवस्था के प्रति विद्रोह ने कर सकें । — विजय सिंह पथिक
जिसके भाग्य में कुछ नहीं होता, सब कुछ उसके हाथ में होता है । — विजय सिंह पथिक
जब तक समाज में विचार क्रांति न हो, तब तक केवल कानून के द्वारा न कोई व्यवस्था स्थाई हो सकती है न शासन — विजय सिंह पथिक
बिना सामाजिक लोकतंत्र स्थापित किए सामाजिक न्याय संभव नहीं है। हमे हमारे पुरानी जाजम व्यवस्था जो कि वास्तविक लोकतंत्र है उसे पुन: स्थापित करना होगा। — विजय सिंह पथिक
भोली और भावुक जनता न तो जनतंत्र चला सकती है और न ही जनतंत्रात्मक व्यवस्थाओं से लाभ उठा सकती है । वह हमेशा किसी न किसी व्यक्ति या वर्ग से ठगी जाती रहेगी । — विजय सिंह पथिक
भारत का राष्ट्रीय जीवन और अधिक उलझन से भरा हुआ है, अतएव अभी वास्तविक स्वतंत्रता को पुन प्राप्त करने, देश की राष्ट्रीय एकता को ग्रहण करने के लिए पुणे कार्यरत होना होगा । जन-जागरण का कार्य करना होगा । — विजय सिंह पथिक
अब तक देश की सार्वजनिक संस्थाओं,मुख्यतः कांग्रेस के सामने अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ने का कार्यक्रम था । स्वभावत: उसका पुरस्कार दमन और कठिनाइयाँ थी । उनमें केवल उन्हीं लोगों के लिए आकर्षण था, जो या तो समझदार होने के साथ साहसी और दूरदर्शी भी थे, या अपनी धुन के पागल और भावुक । — विजय सिंह पथिक
जब तक कांग्रेस एक युद्ध करने वाली संस्था थी वह नैतिकता की ऊंची सतह पर काम कर रही थी । गांधी जी के शब्दों में वह एक लड़ाई पर जाने वाली फौज की तरह थी जो कड़े नैतिक अनुशासन का अनुसरण करती है । वह चुपचाप कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम को ढोए जा रही थी । एक आदर्श सत्य और अहिंसा में विश्वास द्वारा प्रेरणा पाती थी । — विजय सिंह पथिक
राजनीति स्कूलों में पढ़ी जाने वाली वस्तु नहीं है । वह ऐसे विषयों में से है, जो व्यावहारिक शिक्षा द्वारा ही सीखी जा सकती है । यही कारण है कि पंजाब केसरी महाराणा रणजीत सिंह और महाराष्ट्र वीर शिवाजी आदि अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे होकर भी सफल नीतिज्ञ और स्वतंत्र शासक हो गए और इंग्लैंड तक शिक्षा पाए हुए हमारे देसी राजा आज भी लॉर्ड कर्जन के शब्दों में "Linnets in gilded cages" सुनहरी पिंजड़ो की बुलबुलें बने हुए हैं । — विजय सिंह पथिक
हाउस ऑफ़ लॉर्ड या राज्य सभा जैसी संस्थाएं बनाई ही इसलिए जाती है कि यदि जनता के प्रतिनिधियों की व्यवस्थापिका सभा शासन तन्त्र में कोई ऐसा क्रांतिकारी परिवर्तन करना चाहे जिससे बड़े लोगों के स्वार्थ को धक्का पहुंचता हो तो दूसरी व्यवस्थापिका सभा उसे अस्वीकार कर देती है । वह उसे तब तक कानून नहीं बने देती जब तक कि वह सर्वथा या अधिकांश मे उसके अनुकूल न बन जाय । — विजय सिंह पथिक
पार्टी के अनुशासन के नाम पर कोई सरकार या दल अपनी व्यवस्थापिका के सदस्यों और उनके मस्तिष्क को भले ही गुलाम बना ले, परंतु जनता की स्वतंत्र विचार शक्ति को कोई सदा के लिए गुलाम नहीं बन सकता । वह आगे पीछे ऐसी सरकार के अनुशासन को भंग करेगी और अशांति को जन्म देगी । — विजय सिंह पथिक
आज प्रत्येक देश में पुराने ऋषि, पंण्डो, पुजारी और महंतों की जगह 'प्रोफेशनल पॉलीटिशियंस' पेशेवर राजनीतिज्ञों के दल पैदा हो गए हैं यह लोग प्रत्येक चुनाव में जनता को आकर्षित करने के लिए नए-नए स्वाँग रचते हैं और नित्य नए खेल खेलते हैं । जनता बेचारी इन चालों को तो समझने में असमर्थ है परंतु इतना उसे अवश्य विश्वास हो चला है कि यह प्रतिनिधियत्मक संस्थाएं निकम्मी है वे उसका भला नहीं कर सकती । लोगों का व्यवस्थापिका सभाओं से ही नहीं, प्रजातंत्र आदि पर से भी विश्वास उठ चला है वह प्राय: कह देते हैं कि इस बेलगाम प्रजावाद से तो राज्यवाद ही भला था । — विजय सिंह पथिक
प्रजातंत्र में सुधार हेतु यूरोप के राजनीतिक विचारों ने चार नए उपायों का आविष्कार किया है । Referendum , Initiative, Recall and Plebiscite हमारे देश में तो बहुत से शिक्षित तक इन शब्दों से परिचित भी नहीं है । इन शब्दों की बात तो दूर मुंबई कांग्रेस में जो कांग्रेस चुनाव के लिए Single Transferable Vote की पद्धति स्वीकार की गई, उसी के संबंध में कई विद्वान और संपादक तक उस समय यह पूछते देखे गए थे के सिंगल ट्रांसफरेबल वोट किसे कहते हैं । — विजय सिंह पथिक
चेष्टा यह की जा रही है कि सब अपने स्थान पर जैसे है वैसे ही बना रहे और साथ ही जनसत्ता का नाटक भी पूरा कर दिया जाए । भेड़िया, भेड़िया ही बना रहे और बकरी, बकरी ही, परंतु फिर भी दोनों साथ-साथ रह सके और एक दूसरे को हानि न पहुंचवें । परंतु यह असाध्य साधने की चेष्टा है । भेड़िया जब तक घास खाना ना सीखे और बकरी को अभक्ष्य में ना मान ले, तब तक उनका साथ किसी 'सर्कस' में ही हो सकता है, अन्यथा नहीं । — विजय सिंह पथिक
जनता ने चुनाव पर दिए अपने फैसलों के द्वारा यह प्रमाणित कर दिया है कि उसमें विवेकपूर्ण काम और चुनाव करने की योग्यता है। इस प्रकार उसने शासको की कुछ शताब्दियों पहले दी जाने वाली इस दलील को सार्थक खोखला साबित कर दिया है कि शासन संबंधी कामों की बुद्धि और योग्यता केवल शासक वर्ग में ही होती है । — विजय सिंह पथिक
वरिष्ठ सत्ता जो सब राजनीतिक अधिकारों की चल शक्ति है, सारे नागरिकों की संपत्ति है और इसलिए जनता को अधिकार है कि वह चाहे जिस कानून को स्वीकार करें और चाहे जिस कानून को अस्वीकार कर उसका उपयोग में आना रोक दें । ( सेन्टगाल के विधान मे कहे शब्दो को पुस्तक मे उद्धरित किया, Deplogie P.71) — विजय सिंह पथिक
रेफरेंडम का विरोध किए जाने के कुछ विशेष कारण भी है । स्विट्जरलैंड का इतिहास ही इसका साक्षी है । उनके अध्ययन से पता चलता है कि बीच-बीच में भिन्न-भिन्न कानून की आड़ में केंद्रीय सरकार यह कोशिश करती है कि उसके अधिकार बढ़ जाए । परंतु अशिक्षित कहीं जाने वाली जनता इस मामले में इतनी योग्य साबित हुई है कि उसने प्राय हर बार केंद्रीय सरकार को मात दी है । — विजय सिंह पथिक
हमारी व्यवस्थापिकाएं बड़े-बड़े धनिकों के उद्योग धंधों की रक्षा के लिए कानून बनाती हैं,आकाश पाताल एक करती हैं जमीदारों के हितों की रक्षा के लिए लड़ती हैं, परंतु उपरोक्त उदाहरणों जैसे देश के बहुमत पर प्रभाव डालने वाले प्रश्नों की ओर फूटी आंख से भी नहीं देख ती । अर्थात वास्तव में वे जनता की प्रतिनिधि नहीं, स्वामिनी बनाकर आचरण करती हैं । — विजय सिंह पथिक
हमारी व्यवस्थापिकाएं बड़े-बड़े धनिकों के उद्योग धंधों की रक्षा के लिए कानून बनाती हैं,आकाश पाताल एक करती हैं जमीदारों के हितों की रक्षा के लिए लड़ती हैं, परंतु उपरोक्त उदाहरणों जैसे देश के बहुमत पर प्रभाव डालने वाले प्रश्नों की ओर फूटी आंख से भी नहीं देख ती । अर्थात वास्तव में वे जनता की प्रतिनिधि नहीं, स्वामिनी बनाकर आचरण करती हैं । — विजय सिंह पथिक
प्रजातंत्र की रेफरेंडम पद्धति में सब मुख्य कानून स्वीकृति के लिए जनता के सामने रखे जाते हैं और इसलिए व्यवस्थापिका ही क्या सरकार तक में किसी दल की प्रधानता का कोई मूल्य नहीं होता। धनिक लोग जानते हैं कि इन्हें खरीदने से कोई लाभ नहीं और सारी जनता को खरीदने या खुश करने के लिए किसी के पास साधन नहीं हो सकते । — विजय सिंह पथिक
व्यवस्थापिका कार्यकारिणी काउंसिल और न्याय विभाग कोई भी अपनी शक्ति और अपने अधिकार अपने ही स्वामी जनता के विरुद्ध उपयोग में लाने के लिए स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। आज इनमें से प्रत्येक विभाग अपने स्वार्थ से बंधा हुआ है । यह सब बराबर अपने अधिकार बढ़ाने की चेष्टा करते रहते हैं । और यदि अपने अधिकार घटाने बढ़ाने का काम वे बिना जनता की मंजूरी के कर डालने के लिए स्वतंत्र हो तो स्थिति बिल्कुल उल्टी हो जाएगी । अर्थात जनता के बनाए-चुने-हुए एजेंट स्वामी हो जाएंगे और स्वामिनी जनता उनकी दासी बन जाएगी और यह हो रहा है । — विजय सिंह पथिक
आमतौर पर यंत्रालयों के संचालक व्यवहार में रिकॉल की पद्ध्ति (Right to Recall) पर चलते हैं और खराब पुर्जे को एक मिनट भी यंत्र में नहीं रखते, परंतु शासन तंत्र में इस नियम का प्रयोग करने का नाम लेते ही बौखला उठाते हैं। यंत्र के लिए तो कहते हैं कि यदि उसमें खराब पुर्जा रहने दिया जाय, तो उसे एक पुर्जे के कारण सारा यंत्र बिगड़ जाएगा। किंतु शासन तंत्र के लिए वह ही कहते हैं कि इसमें से खराब पुर्जा हटाने से शासन यंत्र बिगड़ जाएगा। पुर्जा खराब हो या अच्छा वह जितनी मियाद के लिए यंत्र में लगाया गया है, उतने समय तक उसमें रखा ही जाना चाहिए । — विजय सिंह पथिक
इसमें शक नहीं कि पहले पहले अखाड़े में उतरने वालों की तरह हमारे नए मतदाता गलतियां करेंगे पटकनी खाएंगे। बार-बार हारेंगे इसमें कुछ नुकसान भी होगा । कुछ गलत आदमी भी चुने जाएंगे। परंतु यह जोखिम किस नए परिवर्तन में नहीं होता? हाँ वह क्षणस्थायी होती है। परंतु आगे चलकर उससे जो अमिट लाभ होंगे उनके मुकाबले में यह हानि और अव्यवस्था कितनी नगर में होगी? — विजय सिंह पथिक
हमारे राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं और अन्य वर्ग के चरित्र में जो दुर्बलता इस समय दिखाई दे रही है, वह कोई नई या आज पैदा हुई वस्तु नहीं है। हजारों वर्षों की पराधीनता ने उसे हमारी नस-नस में पहले ही से भर रखा था। केवल परिस्थितियों के कारण उसके खुलने खेलने के मार्ग बंद थे। इस समय असावधानता इतनी ही हुई कि इस स्थिति के उत्पन्न हो जाने का अंदाजा करके पहले से उसके कुछ उपाय नहीं सोचे गए । शायद विश्व की और देश की बदलती हुई परिस्थितियों भी इस गलती के लिए काफी जिम्मेदार है । — विजय सिंह पथिक