Testimonials

प्रशंसात्मक विचार

Testimonials on Vijay Singh Pathik

“पथिक काम करने वाला है, दूसरे सब बातूनी हैं। पथिक एक सिपाही आदमी है, बहादुर है, जोशीला और तेज मिजाज है, लेकिन जिद्दी है।”

– महात्मा गांधी

“यह वह प्रदेश है, जहां बिजौलिया का विजयी नेता, सरदार पटेल की टक्कर का योद्धा वीर विजय सिंह पथिक अपनी और बेगानों से उपेक्षित होकर निर्वासित सा मथुरा, मन्दसौर और मेवाड़ में कृषि-जीवन बिताने को विवश किया जा सकता है।”

– कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

“पथिक जी केवल नेता, वीर, त्यागी, तेजस्वी, क्रान्तिकारी ही नहीं थे, वे सुकवि, गीतकार, सशक्त लेखक, सफल पत्रकार और राजस्थानी साहित्य के मर्मज्ञ भी थे।”

– श्री सूर्यनारायण

प्रसिद्ध साहित्यकार

“पथिक जी वास्तव में एक महान साहित्यकार, लेखक, कवि, इतिहास शोधक और राजनीतिज्ञ थे। राजनीतिक संघर्ष ने उनके गंभीर पांडित्य, साहित्यकार और कवि को छिपा रखा था। भारत में बहुत कम राजनीतिक नेता उनकी पंक्ति में रखे जा सकते हैं जो इतनी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हों।”

– शंकर सहाय सक्सेना

पथिक जी की जीवनी के लेखक

“बिजौलिया किसान आंदोलन की क्रान्तिकारी युद्ध-प्रणाली और उसके दूरगामी क्रान्तिकारी प्रभाव को भली प्रकार समझने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि हम उसके सूत्रधार श्री विजय सिंह पथिक के व्यक्तित्व को जान लें, जिन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा सत्याग्रह के आविष्कार के पूर्व ही बिजौलिया के किसानों को ऐसा अद्भुत और सशक्त संगठन दिया, जिसकी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी प्रशंसा की थी।”

– डॉ० पद्मजा शर्मा

इतिहास विभाग, राजकीय महाविद्यालय, अजमेर

“पथिक जी राजस्थान के ऐसे सर्वप्रथम महाप्राण व्यक्ति थे, जिन्होंने रियासतों में सामंती ताकतों से टक्कर लेकर उन्हें पहली बार जनशक्ति का बोध कराया था। दबी हुई रियासती जनता में न्याय के लिए राजा, जागीरदार और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध साहस व निर्भीकता से लोहा लेने की भावनाएँ जागृत कीं। लोकधर्म व लोकसेवा के जो आदर्श अपने त्याग व कुर्बानियों से उन्होंने स्थापित किये, उनका इतिहास में कोई मुकाबला नहीं है।”

– सुमनेश जोशी

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पृ० 21

“पथिक जी राजस्थान के ऐसे सर्वप्रथम महाप्राण व्यक्ति थे, जिन्होंने रियासतों में सामंती ताकतों से टक्कर लेकर उन्हें पहली बार जनशक्ति का बोध कराया था। दबी हुई रियासती जनता में न्याय के लिए राजा, जागीरदार और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध साहस व निर्भीकता से लोहा लेने की भावनाएँ जागृत कीं। लोकधर्म व लोकसेवा के जो आदर्श अपने त्याग व कुर्बानियों से उन्होंने स्थापित किये, उनका इतिहास में कोई मुकाबला नहीं है।”

– सुमनेश जोशी

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पृ० 21

“पथिक जी की कार्यप्रणाली में क्रान्तिकारियों का साहस, लोकमान्य तिलक की कूटनीति व गाँधीजी के सत्याग्रह का सामंजस्य था। उनके नेतृत्व में बिजौलिया के किसानों ने जिस संगठन, एकता और बलिदान की भावना का परिचय दिया, उसकी मिसाल भारत में आधुनिक इतिहास में बारडोली को छोड़कर अन्यत्र शायद ही कहीं मिलेगी।”

— रामनारायण चौधरी

बीसवीं सदी का राजस्थान, पृ० 49

“पथिक जी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सात वर्ष जीवित रहे और यह समय उन्होंने घोर आर्थिक तंगी व उपेक्षा में गुजारा पड़ा। सत्ता की आपाधापी में बिजौलिया आंदोलन के यशस्वी प्रणेता पथिक जी को एक तरफ ढकेल दिया गया। राजस्थान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस नरपुंगव के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया गया।”

— डॉ० कन्हैयालाल राजपुरोहित

स्वाधीनता संग्राम में राजस्थान की आहुति, पृ० 219

“पथिक जी का जीवन कार्यशीलता का एक अनुपम उदाहरण था। वह एक क्षण के लिए भी खाली नहीं बैठते थे। कुछ न कुछ करते ही रहना उनका स्वभाव बन गया था। जेल में भी उनका समय लिखने-पढ़ने में ही व्यतीत होता था।”

— नत्थू सिंह पथिक

विजय सिंह पथिक के भतीजे

“जाति-पाँति के पचड़े से वे सदैव कोसों दूर रहे। उनके स्वभाव तक किसी को उनकी जाति का पता नहीं था। गुर्जरों में जाते तो लोग समझते कि ये गुर्जर हैं। जाट अपनी जाति के बताते और राजपूत उनकी वेशभूषा और नाम से उनके राजपूत होने का दावा करते। मथुरा में लोग उन्हें पंजाबी, सिख और कोई पंडित समझते थे।”

— जानकी देवी पथिक

विजय सिंह पथिक की धर्मपत्नी

मैंने बिजौलिया का नाम जब मैं पढ़ता था, तभी से सुना था तथा आज भी इनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा हुआ है। उनका श्रेय बिजौलिया की दो महान विभूतियों—श्री विजय सिंह पथिक और श्री माणिकलाल वर्मा—को है, जिन्होंने देश की खातिर जेल की यातनाएँ सहीं और तन, मन, धन से जनता की सेवा की।

— डॉ० कालूलाल श्रीमाली

भूतपूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री

उदयपुर के बिजौलिया ठिकाने के जनसमूह में बदमाशों के उद्घाटक तथा राजनीतिक चेतना के प्रथम निर्भीक प्रचारक स्वर्गीय भाई विजय सिंह पथिक थे। पथिक जी निश्चय ही बड़े कर्मठ और लगन के व्यक्ति थे।

— बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

प्रसिद्ध साहित्यकार

मेवाड़ में जिस तरह हल्दीघाटी के नाम के साथ प्रताप का नाम जुड़ा हुआ है, उसी तरह पथिक जी के नाम के साथ बिजौलिया अपने आप याद आ जाता है। हल्दीघाटी में जाते ही चेतक घोड़े की टापें सुनाई देती हैं, उसी तरह बिजौलिया क्षेत्र में जाने पर पथिक जी की गूँज सुनाई देती है।

— कुमारराम आर्य

राजस्थान के प्रमुख राजनेता

सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता युद्ध से लेकर 1947 तक स्वतंत्रता यज्ञ में अपनी निरंतर आहुति देने वाला पथिक परिवार सा भारत में विरला ही कोई परिवार होगा। विजय सिंह पथिक ने बापू के चम्पारण के दो वर्ष पूर्व तथा सरदार पटेल के बारडोली के 12 वर्ष पूर्व 1915 में बिजौलिया सत्याग्रह का श्रीगणेश किया था।

— हरिप्रकाश अग्रवाल

वयोवृद्ध लेखक

पथिक जी जिस समय बिजौलिया आये, उनकी वेशभूषा पूरी सैनिक थी। कमर में तलवार, शिकारी कोट की दोनों बड़ी-बड़ी जेबों में करीब 150 कारतूस व 12 कारतूस वाले रिवाल्वर से सुसज्जित थे। सिर पर शेखावाटी ढंग की पाग तथा धोती पहने हुए थे। चेहरा दाढ़ी से रौबीला था और पंचकेशी से युक्त सिर, एक ऋषि का रूप सा था।

— साधु सीताराम दास

पथिक जी के प्रमुख साथी

पथिक जी का स्तर महात्मा गांधी और पं० जवाहरलाल नेहरू के मुकाबले का था।

— काका त्रिलोकचन्द

सम्पादक, दैनिक ‘हिन्दू’, अजमेर

मैं दावे के साथ कहता हूँ कि गांधी जी के आश्रम से पथिक जी का राजस्थान सेवा संघ कई दृष्टियों से बहुत आगे था।

— रामनारायण चौधरी

वरिष्ठ गांधीवादी नेता

स्वर्गीय विजय सिंह पथिक राजस्थान के देशी राज्य प्रजा स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख सेनानी थे। उनकी सेवाओं के लिए राजस्थानियों की पीढ़ियाँ सदैव ऋणी एवं कृतज्ञ रहेंगी।

— बी०एन० जोशी

पूर्व मंत्री, राजस्थान

पथिक जी के कार्य इतने महान हैं कि हम उनकी कल्पना भी नहीं कर सकते।

— दुर्गाप्रसाद चौधरी

सम्पादक, दैनिक ‘नवज्योति’

यदि पथिक जी पूँजीवादी बोध से लदा गांधीवादी चोला पहन लेते तो गांधी जी को सत्ता के बंटवारे में डॉ० राजेन्द्र बाबू के लिए किसी नये पद की खोज करनी पड़ती।

— जगदीश प्रसाद दीपक

सम्पादक ‘मीरा’

जिस व्यक्ति के नाम मात्र से ही ब्रिटिश सरकार की छत्रछाया में चलने वाले देशी रजवाड़े घर-घर काँपते हों और जिस व्यक्ति के सिर के लिए इनाम की घोषणा कर रखी हो, उस व्यक्ति के कार्यों की कल्पना कीजिए।

— मोहन राज भंडारी

पूर्व मंत्री, राजस्थान

श्री विजय सिंह पथिक राजस्थान के लाखों शोषित-पीड़ित और पददलित किसानों के त्राता के रूप में सदैव स्मरण किये जायेंगे। वे अब से लगभग एक सदी पूर्व इस पिछड़े प्रदेश की जन जागृति के जनक रहे हैं।

— युगल किशोर चतुर्वेदी

पत्रकार, नेता व स्वतंत्रता सेनानी

राजस्थान में यदि मैं किसी से प्रभावित हुआ तो श्री विजय सिंह पथिक से। पथिक जैसे देशभक्त का अंतिम समय जिस प्रकार व्यतीत हुआ, वह कांग्रेस शासन के लिए शर्म की बात है।